आज मेरे ख्वाब भी स्वार्थी हुए
मैं स्वजनों का ख़्याल नहीं पाता हूँ
दूसरों की बात करने का समय नहीं
मैं खुद को भी देख नहीं पाता हूँ
काश, देखता मैं मस्तक की झुर्रियाँ
और मेरे चित्त का चिंतन होता किंतु
अनगिनत आँखों में छिपे सपनों को
मैं समझ नहीं पाता हूँ, औरो की छोड़ो
मैं खुद को भी देख नहीं पाता हूँ
मायूस चहरे पर दफ़न होते हैं राज़ कई
काश मैं उसे ज़ाहिर कर सकता लेकिन
अधरों की अचल मुस्कान को भी आज
मैं पढ़ नहीं पाता हूँ, औरो की छोड़िए
मैं खुद को सिखा नही पाता हूँ
आवाज़ बतलाए उम्र अनुभव की
काश मैं उसे उतार सकता लेकिन
किसी के रोने की आवाज़ को मैं आज
दरकिनार कर जाता हूँ, औरो की छोड़िए
मैं खुद का ख़्याल नहीं पाता हूँ



